emotional story about love

Oye musalman – an emotional story about love.

मुसलमान हमारे ही देश के हमारे अभिन्न पड़ोसी है । हिन्दू मुस्लिम अक्सर एक दूसरे के साथ भेदभाव की भावना रखते हैं । बहुत से हिन्दू कुछ शरारती तत्वों द्वारा किये गए गलत कार्यो की वजह से समूचे मुसलमानों से नफरत करते है । ऐसे ही एक लड़के की कहानी पेश करने जा रहा हूँ। emotional story about love मेरा मकसद इस कहानी से भाईचारे व दोस्ती की भावना फैलाना है ना कि किसी के दिल को दुखाना । उम्मीद है कहानी आपको पसंद आएगी।



emotional story about love
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Oye musalmaan – an emotional story about love.

 

सुमित शहर की एक छोटी सी कॉलोनी में किराये के मकान में रहता है। ग्राउंड फ्लोर में वह अकेला ही किराये के मकान में रह रहा था। बाकी कुछ परिवार ऊपर वाले फ्लोर में अपना गुजर बसर कर रहे थे।

सुमित पास में ही एक तकनीकी उद्योग में मशीन ऑपरेटर के पद पर कार्यरत है। रोज सुबह अपने काम पर जाता है और शाम को लौट के आता है। स्वभाव थोड़ा गुस्सेल से है। इस कारण साथ के पड़ोसियों से कुछ ज्यादा बनती नही ।

 

अचानक एकदिन सुमित के ही पास वाले कमरे में असलम भी अपना समान लेकर आ जाता है। उसने आज ही ये कमरा किराये पर लिया है। सुमित को भी एक पड़ोसी उसके ही फ्लोर  में मिल गया।

शाम को जब सुमित कंपनी से छूटी करके वापिस आता है तो देखता है सामने एक लड़का कमरे की साफ सफाई कर रहा है। सुमित उसके पास जाता है और उस से पूछता है

 

हां भाई नए आये हो।

 

असलम – जी भाईजान आज ही आया हूँ ।

 

सुमित – क्या नाम है तुम्हारा , ओर क्या करते हो।

 

असलम – भाईजान असलम खान यही एक कंपनी में हूँ ।

 

सुमित – ओये तू मुसलमान है क्या ?

 

असलम – हांजी भाईजान ।

 

सुमित – गुस्से में मुह बनाते हुए । देख मुझे मुसलमान से नफरत है ok । ऐसी की तैसी कर दी मूसल मानो ने देश की । आतंकवादी ।

 

असलम – भाईजान ऐसा तो मत कहिये सभी मुसलमान आंतकवादी नही होते । सब एक जैसे नही होते ।

 

सुमित – तू मुझे अच्छाई बुराई का पाठ मत पढ़ा । बस मेरे सामने मत आया कर । अपने काम से काम रखना । और ज्यादा हल्ला गुल्ला मुझे पसंद नही ।

 

असलम – ठीक है भाई जी मैं तो यहाँ चार पैसे कमाने के लिए आया हूँ। मैंने क्यों हल्ला करना ।

 

सुमित – हाँ बस ध्यान रखना । और पैर पटकते हुए वहाँ से निकल जाता है।

 

अगले दिन सुबह सुमित उठ के नहा धो के तैयार होके काम पर निकल ही रहा होता है कि सामने से तभी असलम भी दरवाजा खोल के बाहर आता है और उसे देखते ही सुमित आग बबूला हो उठता है ।

 

भूतनी के कर दिया न सारा मूड ऑफ, सुबह सुबह दिखा दी अपनी मनहूस शक्ल । पूरा दिन बेकार जायेगा आज का। तू थोड़ी ओर देर अंदर नही रह सकता था क्या। साले मेरे जाने के वक़्त पे ही अपना चौखटा दिखाना था । अब थोड़ी देर रुक के निकलना पड़ेगा ।

 

 

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असलम – ऐसी भी क्या गलती कर दी भाई जी । मुझे नही पता था कि आप हम लोगो से इतनी नफरत करते है। हम भी तो इंसान ही है । और मुझे कौन सा पता था कि आप भी अभी बाहर आएंगे ।

 

सुमित – तू चुपचाप निकल यहाँ से समझा वरना पता चल जाएगा कि कितनी नफरत करता हु मैं तुम लोगों से । ओर इंसानियत वाली कोई बात ही नही तुम में । समझा चल निकल ।

 

असलम चुपचाप उसके आगे से अपने काम पर निकल जाता है । शायद वो यहाँ नया है और बाहर से है इसलिए सुमित के दबाव में आ गया । असलम शरीर और उम्र में था भी सुमित से कम । तो उस से पंगा लेना उसके लिए ही ठीक नही था वो बस चुपचाप अपना काम करना चाहता था ।

 

ओर इधर सुमित उसे ओये मुसलमान कह कह कर फटकारता रहता था ।

 

दूसरे ही दिन शाम को जब सुमित काम से वापिस लौटा तो असलम उसकी बाल्टी से पानी ले रहा था शायद उसके पास अभी पानी स्टोर करने का कोई ज्यादा बन्दोबस्त नही था ।

 

सुमित ने जब उसे देखा तो आंख में खून उतर आया ।

 

उसके पास जाके – ओये मुसलमान तेरा दिमाग खराब हो गया है क्या मैं पानी भर भर के रखूं ओर तू स्वाद ले । साले दिमाग मे नही घुसता क्या तेरे । समझ मे नही आता क्या ।

मेरी बाल्टी को हाथ भी कैसे लगाया तूने। कैसे छुआ ।

 

असलम – भाईजान वो मेरे पास पानी खत्म हो गया था । वाशरूम जाना था तो थोड़ा सा पानी ले रहा था । सॉरी मेरे पास एक ही बाल्टी है ।

 

सुमित – तो वो भी मैं खरीद के दु तुझे । खुद से नही ले सकता । जब मालूम है किराये पर रहना है तो सारा इंतज़ाम नही कर सकता था पहले ही । मेरी बाल्टी को दोबारा हाथ भी मत लगाना ओर अभी के अभी ये बाल्टी अच्छे से धो के रख यहाँ । वरना फिर देख लेना आज तू ।।।।

 

असलम – जी भाई जान अभी रखता हूं ।

 

ओर असलम उसकी बाल्टी को धो के रख देता है । सुमित उसपर धौंस जमाये जाता है। वो न जाने क्यों उस से इतनी नफरत करने लगा था । बस हर बात में उसे ओये मुसलमान ठीक से रह ले , ये वो  पता नी क्या क्या सुनाता था ।

 

कुछ दिन बाद रोज के जैसे असलम सुबह सुबह सुमित के काम पर निकलने की वैट कर रहा था ताकि उसके बाद वो भी निकल सके । लेकिन आज सुमित बाहर ही नही निकला वो देखता रहा और अंत मे खुद ही निकल कर काम पर चला गया ।

 

शाम को लौटा तो भी उसने आकर इधर उधर नज़र घुमाई सुमित कही दिख ही नही रहा था । आज गया किधर सुबह से नही दिखा उसने अपने मन मे सोचा ।

 

तभी उसने सुमित के कमरे की खिड़की में से अंदर झाँका तो पर्दे के बीच से हल्का उसे दिखाई दिया सुमित गर्मी में भी रजाई लिये लेटा है। उसने सोचा थका होगा या ज्यादा पी ली होगी तभी ऐसे पड़ा है । और असलम अंदर चला गया अपने कमरे में ।

 

उसके मन मे इतना जरूर था कि आज सुमित को हुआ क्या होगा । और इसी सोच के साथ खाना खाकर वो सो गया ।

 

सुबह उठ के नहा धो के तैयार होके वही रोज के जैसे सुमित के निकलने का इंतज़ार करने लगा । लेकिन आज भी कल के जैसे सुमित बाहर नही आया । सुबह से अबतक । अब असलम के दिमाग मे चिंता जाग गयी । ठीक भी है या नही । क्यों दो दिन से नही निकला ।



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उसने फिर खिड़की में से अंदर देखा तो अंदर सुमित बुरी तरह कांप रहा है । रजाई ओर कम्बल दोनों ओढ़े हुए है । असलम समझ गया कि उसे बुखार है । एकबार उसने सोचा कि ऐसे खडूस इंसान से क्या इंसानियत रखनी । फिर उसने सोचा कि पड़ोसी होने के नाते उसका फ़र्ज़ बनता है उसे देखना या पूछना ।

 

हिम्मत करके असलम ने सुमित के दरवाजे को खटखटाया तो दरवाजा खुला होने के कारण अंदर को हल्का सा खुल गया । उसने जरा सा अंदर होके आवाज दी

 

सुमित भाई जी आप ठीक तो है ।

 

जवाब नही आया उसने दोबारा यही पूछा फिर भी कोई जवाब नही मिला । तो वो अंदर को उसके पास चला गया और पास जाके बोला

 

भाई साहब तबियत तो ठीक है ना ।

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इस बार भी उसे कोई जवाब नही मिला । उसने फिर उसे हाथ से हिलाया ओर पूछा । लेकिन सुमित कोई जवाब नही दे रहा था । असलम ने हाथ उसके माथे पर रखा तो सिर भट्टी के जैसे तप रहा था । और पसीने से भीगा हुआ था । इतना बुखार देख कर असलम को चिंता हुई । उसको जगाने की कोसिस की मगर सुमित बेहोश था ।

 

फिर असलम भाग के साथ वाली मार्किट में गया और वहाँ डॉक्टर का पता करके उसके पास गया । उसे सुमित की हालत के बारे में बताकर सुमित के रूम ले आया ।

 

डॉक्टर ने बैग से थरमामीटर निकाला और सुमित की बाजू के नीचे रख दिया । थोड़ी देर बाद निकाल के देखा तो डॉक्टर की आंखे फ़टी रह गयी ।

 

ओह्ह तेरी इतना बुख़ार , इसको तो बहुत ही ज्यादा बुखार है । अगर तुम थोड़ी ओर देर कर देते तो शायद ये जिंदा नी होता । इसने कुछ खाया है क्या ।

 

असलम – पता नहीं डॉक्टर साहब कल से लेटे है ये बस्तर पे , मैंने तो अभी देखा इनको तो आपको बुला लिया । अब आप देख लो ।

 

डॉक्टर – चलो इंजेक्शन तो लगाना पड़ेगा । जब होश में आ जाये तो मैं दवाई देता हूं खाना खिला के या दूध पिला के दे देना । देखते है अभी नही तो हॉस्पिटल ले जाना पड़ेगा ।

 

डॉक्टर ने इंजेक्शन भरा ओर सुमित के कूल्हे पर लगा दिया और डॉक्टर के कहे अनुसार अस्लम ने सुमित के सिर में तेल पानी की मालिश की ।

 

करीब आधे घण्टे बाद सुमित में हलचल हुई असलम उठ के एकदम डॉक्टर के पीछे आ गया । सुमित ने धीरे से आंखे खोली ओर डॉक्टर को सामने देख कर हैरानी से

 

ओह्ह डॉक्टर साहब आपको किसने बुलाया और क्या हुआ था मुझे । और ये मुसलमान क्या कर रहा यहां ।

 

डॉक्टर – देख भाई तेरी हालात खतरनाक थी । तो बेहोश था पता नही कब से । ये तो भला हो इस लड़के का जो मुझे बुला लाया वरना आधा घण्टा औऱ ऐसे ही रहता तो आज तू नही होता इस दुनिया मे । 106 बुखार था तुझे । होश तक नही था इसी ने बुलाया मुझे ओर तेरे सिर पर आधा घण्टा लगातार मालिश की तब जाके थोड़ा बुखार गिरा है तेरा ।

 

इस बन्दे की दी हुई समझ बस अपनी जिंदगी अगर ये काम पर निकल गया होता तो अब तक भीड़ होती यहाँ ।

 

छोटे मोटे बुखार में दिखा लेना चाहिए इग्नोर करके भारी पड़ जाता है ।

 

सुमित – ओह्ह अच्छा जी डॉक्टर साहब । बस मैंने सोचा हो जाऊंगा ठीक । इतनी नौबत आ गयी थी ।

 

डॉक्टर – हाँ । अच्छा ठीक है मैंने दवाई दी है कुछ खा पी के लेना । और एक बार शाम को जरूर चेक करवा लेना ok ।




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सुमित – ओक जनाब, पैसे मैं शाम को ही दे दूंगा आपके atm से निकालने पढ़ेंगे । थैंक यू ।

 

ओर डॉक्टर के जाने के बाद असलम भी बाहर को जाने लगा दवाई मेज पर रख कर । पीछे से सुमित ने आवाज़ लगाई

 

 

ओये मुसलमान !!

 

असलम घबरा कर पीछे मुड़ा के कर बुरे का भला आज नी छोड़ने वाला ये आज तो इसके कमरे में ही घुस गया था मैं ।

 

सुमित – ओये चल अपना बोरिया बिस्तर उठा !

 

असलम – सहम कर क्यों भाई जी ।

 

सुमित – उठा ना और ईधर आजा मेरे कमरे में एक साथ रहेंगे दो दो कमरों का किराया बचेगा । एक का देंगे वो भी आधा आधा ।

 

असलम को समझ नही आ रहा था कि कैसे रियेक्ट करे । बोल क्या रहा है ।

 

सुमित – ज्यादा टेंशन मत ले यार बस समझ ले के मेरी गलती थी और उसका मुझे एहसास है । मैं समझ गया कि काम आखिर सच्चा इंसान ही आता है ।

 

असलम – जी भाई जी ।

 

सुमित – चल अब ले आ भी समान अपना या फिर सॉरी बुलवा के ही रहेगा ।

 

असलम – नही भाई जी ऐसी बात नही वो मैं

 

सुमित – क्या वो मैं वो मैं कर रहा है नही रहना तो तेरी मर्जी पर मेरी बात सुन सॉरी तो मैं बोलूंगा नही पर दिल से थैंक्स तुझे यार । शायद कोई अपना भी ऐसा नही सोचता मेरे लिये ।

चल अब दोस्त बनके रहेंगे साथ साथ और फिर बाल्टी भी चार चार हो जाएंगी । अब सवाल जवाब छोड़ औऱ आजा ।

 

असलम के चेहरे पर अब मुस्कान थी । और स्माइल करते हुए ठीक है भाई जी । जैसी आपकी मर्जी बस लड़ना मत मुझसे ।

 

सुमित – नही लड़ूंगा मेरे भाई यार तूने दिमाग की नसें खोल दी तेरे लिए दिल मे जगह बन गयी । मैं तो धर्म के नाम पर ऐसे ही अड़ा हुआ था । बताऊंगा वो भी तुझे क्यों करता था मैं इतनी नफरत ।

 

फिर कभी ।

अभी आजा । पर देख मैं बोलूंगा ओये मुसलमान ही तुझे बस फर्क ये होगा कि अब प्यार से होगा ।

 

असलम – हाहा कोई बात नही भाई जान मैंने तब बुरा नही माना अब तो मेरेको एक दोस्त ही मिल गया ।

 

थैंक यू भाई जी ।




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दोस्तो बहुत से लोग कुछ गलत लोगो की वजह से पूरे धर्म, समुदाय या जाति से नफरत करने लग जाते है । लेकिन ये नही देखते के बुराई धर्म जाती में नही बल्कि इंसान में होती है । और सब इंसान एक जैसे नही होते । मेरी इस कहानी का बस इतना समझाना मकसद है कि हम लोगो ने आज के वक़्त में जो ये धार्मिक नफरत पैदा कर ली है उसे खत्म कर दो वरना हम जो खो देंगे वो कभी हासिल नही कर पायेंगे । कहानी कैसी लगी जरूर बताएं ओर अपने एक ऐसे दोस्त को जरूर शेयर करें जो आपकी जान हो ।

 

मुस्कुराते रहिये ।

 

लेखक :-

 

सुनील कुमार ।

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